Dev Uthani Ekadashi 2025: देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु जागते हैं, जिसके बाद ही करना है शुभ कार्य 1 नवंबर 2025 से शुरू होंगे शुभ कार्य . आचार्य राजेंद्र ने इसका महत्व बताया.
शहडोल. सनातन धर्म में देवउठनी एकादशी (जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं) का विशेष महत्व है. इस दिन के बाद से सभी तरह के शुभ कार्यों का संपादन प्रारंभ हो जाता है- जैसे विवाह, उपनयन (यज्ञोपवीत संस्कार), गृह प्रवेश, और अन्य संस्कार. इसकी वजह यह मान्यता है कि भगवान विष्णु 4 महीने सोते हैं और 8 महीने जागते हैं. आइए,अमरावती आश्रम चित्रकूट स्वामी निर्भय दास महाराज के शिष्य ज्योतिषी, वास्तु शास्त्री एवं हस्त रेखा विशेषज्ञ आचार्य राजेंद्र से जानते हैं कि यह परंपरा क्यों और कैसे निभाई जाती है.
आचार्य राजेंद्र बताते हैं, सनातन धर्म में देवउठनी एकादशी का दिन बहुत महत्वपूर्ण है. इसे हरि प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागते हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु आषाढ़ मास की हरिशयन एकादशी (जिसे शयनी एकादशी भी कहते हैं) को क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी को पुनः जागते हैं. इस अवधि में भगवान के सोने के 4 महीने (आषाढ़ से कार्तिक तक) को चातुर्मास कहा जाता है. चातुर्मास के दौरान कई शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है, क्योंकि इस समय भगवान निद्रा में होते हैं और संसार की सृष्टि का संचालन भगवान शिव और देवी पार्वती के हाथ में होता है.
क्यों नहीं होते शुभ कार्य?
आचार्य राजेंद्र बताते हैं, जब भगवान विष्णु हरि सायन एकादशी पर शयन करते हैं, तब से लेकर देवउठनी एकादशी तक के 4 महीने को अशुभ माना जाता है. इसलिए इस अवधि में विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश, और अन्य महत्वपूर्ण संस्कार नहीं किए जाते. ऐसा माना जाता है कि भगवान की निद्रा में होने से सृष्टि की ऊर्जा और संतुलन में परिवर्तन होता है, इसलिए इन महीनों में शुभ कार्यों का संपादन वर्जित है.
आचार्य राजेंद्र बताते हैं, जब भगवान विष्णु हरि सायन एकादशी पर शयन करते हैं, तब से लेकर देवउठनी एकादशी तक के 4 महीने को अशुभ माना जाता है. इसलिए इस अवधि में विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश, और अन्य महत्वपूर्ण संस्कार नहीं किए जाते. ऐसा माना जाता है कि भगवान की निद्रा में होने से सृष्टि की ऊर्जा और संतुलन में परिवर्तन होता है, इसलिए इन महीनों में शुभ कार्यों का संपादन वर्जित है.
देवउठनी एकादशी (इस वर्ष 1 नवंबर 2025 को) के बाद भगवान विष्णु जागते हैं, और तब से सभी शुभ कार्यों का फिर से प्रारंभ हो जाता है. आचार्य राजेंद्र कहते हैं, 1 नवंबर के बाद से जितने भी प्रकार के संस्कार हैं- उपनयन, विवाह, गृह प्रवेश, और अन्य शुभ कर्म- उनका संपादन किया जा सकता है. यह समय सृष्टि के जागरण का समय है, इसलिए इसे शुभ माना जाता है.
भगवान के 4 महीने सोने और 8 महीने जागने का रहस्य
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु का एक दिन मानवों के 1 वर्ष के बराबर होता है. उनकी एक रात 4 महीने और एक दिन 8 महीने का माना जाता है. इसीलिए: आषाढ़ शुक्ल एकादशी (हरि शयन एकादशी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं. यह चातुर्मास का आरंभ होता है, जिसमें भगवान 4 महीने सोते हैं. कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को भगवान जागते हैं, और तब से शुभ कार्यों का संपादन फिर से शुरू हो जाता है.
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु का एक दिन मानवों के 1 वर्ष के बराबर होता है. उनकी एक रात 4 महीने और एक दिन 8 महीने का माना जाता है. इसीलिए: आषाढ़ शुक्ल एकादशी (हरि शयन एकादशी) को भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करने चले जाते हैं. यह चातुर्मास का आरंभ होता है, जिसमें भगवान 4 महीने सोते हैं. कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को भगवान जागते हैं, और तब से शुभ कार्यों का संपादन फिर से शुरू हो जाता है.
आचार्य राजेंद्र बताते हैं, भगवान की यह निद्रा और जागरण की कथा हमें यह सिखाती है कि सृष्टि का संतुलन और ऊर्जा चक्र भी बदलता रहता है. जब भगवान जागते हैं, तब संसार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और इसलिए यह समय शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है.
इस वर्ष की तिथियां-
1. देवउठनी एकादशी के बाद ही करें शुभ कार्य: 1 नवंबर 2025 के बाद विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश, और अन्य संस्कार करने चाहिए.
2. चातुर्मास में सावधानी: आषाढ़ से कार्तिक तक के 4 महीने में कोई भी शुभ कार्य न करें. इस समय में धार्मिक अनुष्ठान, व्रत और भगवान शिव की आराधना पर ध्यान दें.
3. भगवान विष्णु की आराधना: देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु को जगाने के लिए विशेष पूजा करें, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, और तुलसी दल अर्पित करें.
4. शास्त्रीय कारण: यह मान्यता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ज्योतिषीय और प्रकृति के चक्र से भी जुड़ी है. चातुर्मास में वर्षा ऋतु होती है, और कई बार मौसम की वजह से भी शुभ कार्यों में बाधा आती है, इसलिए शास्त्रों ने इस अवधि को अशुभ माना है.
1. देवउठनी एकादशी के बाद ही करें शुभ कार्य: 1 नवंबर 2025 के बाद विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश, और अन्य संस्कार करने चाहिए.
2. चातुर्मास में सावधानी: आषाढ़ से कार्तिक तक के 4 महीने में कोई भी शुभ कार्य न करें. इस समय में धार्मिक अनुष्ठान, व्रत और भगवान शिव की आराधना पर ध्यान दें.
3. भगवान विष्णु की आराधना: देवउठनी एकादशी पर भगवान विष्णु को जगाने के लिए विशेष पूजा करें, विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, और तुलसी दल अर्पित करें.
4. शास्त्रीय कारण: यह मान्यता केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ज्योतिषीय और प्रकृति के चक्र से भी जुड़ी है. चातुर्मास में वर्षा ऋतु होती है, और कई बार मौसम की वजह से भी शुभ कार्यों में बाधा आती है, इसलिए शास्त्रों ने इस अवधि को अशुभ माना है.
सनातन धर्म में देवउठनी एकादशी का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु अपनी निद्रा से जागते हैं और शुभ कार्यों का संपादन फिर से प्रारंभ होता है. आचार्य राजेंद्र के अनुसार, 1 नवंबर 2025 के बाद सभी प्रकार के संस्कार- विवाह, उपनयन, गृह प्रवेश आदि किए जा सकते हैं, क्योंकि भगवान विष्णु जाग चुके होते हैं. भगवान के 4 महीने सोने और 8 महीने जागने की यह कथा न केवल एक पौराणिक मान्यता है, बल्कि यह सृष्टि के ऊर्जा चक्र और प्रकृति के संतुलन को भी दर्शाती है. इसलिए, सनातन धर्म में इस परंपरा का पालन करना न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और संतुलन बनाए रखने का भी एक तरीका है.